बांस शिल्प रोजगार रास्ता

रायपुर, 01 जुलाई 2009 - छत्तीसगढ़ में पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग द्वारा संचालित गरीबी उन्मूलन परियोजना 'नवा अंजोर' की सहायता से महासमुंद जिले के आदिवासी बहुल गांव वनसिवनी की महिलाओं ने समहित समूह बनाकर बांस शिल्प से रोजगार का रास्ता खोज लिया है।

बांस शिल्प से इनका भाग्य चमका और कभी अभावों में जीवन यापन करने वाले समूह को अब प्रतिमाह चार हजार रूपए की आमदनी प्राप्त हो रही है। परियोजना के तहत व्यवसाय के लिए समूह को 36 हजार 500 रूपए की आर्थिक सहायता प्रदान की गई। समूह द्वारा बांस से कलात्मक मूर्तियों सहित स्टैण्ड, चटाई, झूमर, पंखे, झाडू और सजावटी धरेलू वस्तुओं का निर्माण किया जा रहा है।

समूह अपनी बनाई गई कलाकृतियों और सामग्रियों को छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि पूरे देश में बाजार के माध्यम से बिक्रय का प्रयास कर रहा है। इसके लिए समय-समय पर आयोजित होने वाले मेलों, प्रदर्शनियों में स्टॉल लगाने के साथ-साथ छत्तीसगढ़ हॉट और दिल्ली हॉट में भी स्टॉल लगाने का प्रयास किया जा रहा है।

मितानिन महिला समूह की सात सदस्यों में से मनटोरा बाई, मीना बाई, अमारी, सीताबाई, बीरज, कुनती बाई ने बताया कि हम सभी मजदूरी और वन संपदा पर निर्भर थे। कुछ परिवारों की आर्थिक स्थिति बहुत ही कमजारे थी। इसकी मुक्ति के लिए कुछ महिलाओं को संगठित कर दिया। समहित समूह की महिलाओं ने बताया कि ग्राम पंचायत ने मुनादी कराई कि नवा अंजोर परियोजना द्वारा ऐसे ग्रामीणों को आर्थिक सहयोग दिया जा रहा है जो स्वयं का व्यवसाय प्रारंभ करना चाहते है, फिर क्या था, हम सभी महिलाओं ने जिला पंचायत कार्यालय में अधिकारियों से मिलकर मितानित समहित समूह का गठन किया। समूह के सदस्यों को बांस की लकड़ी से वर्तन और गृह सज्जा उपयोगी वस्तुओं के निर्माण का अनुभव था, अत: हमने इसी व्यवसाय को चुना।

व्यवसाय शुरू करने के लिए 40 हजार रूपए की परियोजना तैयार की गई। आर्थिक सहायता के लिए 5 प्रतिशत धनराशि जमा कराई। इसके बाद 16 हजार रूपए की पहली किश्त प्राप्त होने पर बांस, कच्चा माल, औजार और अन्य उपयोगी सामग्री खरीद कर व्यवसाय शुरू किया। बांस से निर्मित सौदर्य सामग्रियों को गांव के आस-पास के हॉट-बजारों, शहरों, मेलों और प्रदर्शनियों में बेचने लगे। दूसरी किश्त 20 हजार 500 रूपए की मिलने के बाद व्यवसाय को गति मिली और समूह को प्रतिमाह चार हजार रूपए की आमदनी होने लगी। सदस्यों ने बताया कि परियोजना के सहयोग से समूह के प्रत्येक सदस्य का भरण-पोषण अब सुचारू रूप से हो रहा है। बच्चों को भी अच्छी शिक्षा दी जा रही है। परियोजना के माध्यम से जीविका उपार्जन का साधन मिलने से समूह के सभी परिवार खुश है।