छत्तीसगढ़ मानसून बारिश

धान की कम अवधि की किस्में ही लगाएं किसान
छत्‍तीसगढ़ रायपुर, 02 जुलाई 2009 - छत्तीसगढ़ में मानसून की बारिश होते ही खेतों में बीज बोवाई का काम शुरू हो गया है। प्रदेश की प्रमुख फसल धान की खुर्रा बोनी के साथ-साथ रोपा पध्दति और मेडागास्कर विधि से खेती के लिए किसानों ने नर्सरी लगाना भी शुरू कर दिया है।

मानसून में देरी और वर्षा की अनिश्चित्ता को ध्यान में रखते हुए कृषि विभाग के अधिकारियों ने किसानों को किसी भी स्थिति में लंबी अवधि की धान की किस्में जैसे-स्वर्णा, एम.टी.यू.-1001, मासूरी आदि नहीं लगाने की सलाह दी है।

कृषि मंत्री श्री चन्द्रशेखर साहू ने भी विभागीय अधिकारियों और मैदानी अमले को अपने निर्धारित कार्य क्षेत्रों में किसानों के खेतों की सतत निगरानी करते हुए किसानों को स्थानीय जरूरतों के अनुसार उचित सलाह देने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने बताया है कि लम्बी अवधि की धान की किस्में लगाने से पकने की अवस्था में रात का तापमान कम होने की दशा में धान की फसल में दाने ठीक तरह से नहीं भर पाएगें जिससे बदरा की स्थिति निर्मित होने पर किसानों को नुकसान उठाना पड़ सकता है।

प्रदेश के अधिकांश क्षेत्रों में अब तक सामान्य से कम वर्षा होने के कारण खरीफ फसलों की बोनी में कमी तथा जिन क्षेत्रों में बोनी की जा चुकी है, वहां अपर्याप्त नमी के कारण बीजों के अंकुरण पर विपरीत प्रभाव पड़ने की स्थिति को चिंताजनक बताया गया है। कृषि विभाग के अधिकारियों ने धान की बुआई हेतु आई.आर-64, एम.टी.यू-1010 जैसी जल्दी पकने वाली धान की किस्मों के बीज बोने की सलाह दी तथा कहा कि आई.आर-64, एम.टी.यू-1010, के बीज बहुत से किसानें के पास उपलब्ध है अत: जिन किसानों के पास इन किस्मों के बीज उपलब्ध नहीं है, वे अन्य किसानों से इनके बीज आपस में बदल कर प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने जहां धान की बुआई नहीं हो पायी है वहां कम वर्षा होने की स्थिति में भी धान की बुआई न करने की सलाह दी है।

कृषि विभाग ने सलाह दी है कि शीघ्र पकने वाली धान की किस्मों के बीजों की बुआई करने से पहले उनकी अंकुरण क्षमता का परीक्षण कर 80 प्रतिशत से कम अंकुरण होने की स्थिति में आवश्यक अनुपात से बीज की दर बढ़ाकर बोनी करना चाहिए। कृषि वैज्ञानिकों ने धान के विषय में किसानों को सलाह दी गयी है कि धान के खेतों में जब तक पर्याप्त मात्रा में नमी न हो तब तक उर्वरकों का उपयोग न किया जाए। उर्वरकों का उपयोग ब्यासी के बाद करना चाहिए तथा ब्यासी न होने की दशा में खेतों में निंदाई कर उर्वरकों का उपयोग किया जा सकता है। हल्की व ढलवा भूमि वाले क्षेत्रों में शीघ्र पकने वाली धान के साथ अरहर या तिल की मिलवा खेती भी की जा सकती है।

कृषि अधिकारियों ने आगे बताया कि जिन किसानों के पास उड़द, तिल एवं मूंग के बीज उपलब्ध हों वे हल्की मिट्टी वाले क्षेत्रों में उन्हें जुलाई के अंत तक बो सकते हैं। जुलाई के अंत तक जिन क्षेत्रों में बुआई का काम नहीं हो पाया है वहां अब तिल, कुल्थी, रामतिल या उड़द की बुआई की जा सकती है। वर्षा होने पर खेतों में डबरी या जलग्रहण क्षेत्रों में पानी इकट्ठा करने की व्यवस्था किसानों द्वारा की जानी चाहिए ताकि उस जल का बाद में आवश्यकता पड़ने पर सिंचाई के लिए उपयोग किया जा सके।