विधवा महिला ने सरकारी सहायता से बनाया कैरिएर

किराना दुकान से आबाद हुई हीरा की दुनिया, महिलाओं को सहारा सरकारी
रायपुर 22 नवम्बर 2011 - स्वाभिमानी और खुद पर विश्वास रखने वाले व्यक्ति कभी दूसरों पर बोझ बनना नहीं चाहते। ऐसे लोग हर मुश्किल परिस्थिति में खुद की राह तलाश ही लेते हैं। इसी तरह छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले की निवासी श्रीमती हीरा यादव भी पति की मृत्यु के बाद किसी पर बोझ नहीं बनना चाहती थी, इसलिए उन्होंने कोरबा में किराए के कमरे में छोटा सा किराना दुकान खोला और साथ में सिलाई कार्य कर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ती रहीं। आज उनके पास किराए का नहीं बल्कि खुद का किराना दुकान है। इस दुकान से उन्हें हर माह 8-10 हजार रूपए की आमदनी हो जाती है। श्रीमती हीरा किराना दुकान से होने वाली आमदनी से अपने छोटे भाई और अपनी मां का भी पालन-पोषण कर रही हैं। 

श्रीमती हीरा यादव ने बताया कि वर्ष 2008 में उनके पति की मृत्यु हो गई, इसके बाद वे अपने मायके कोरबा आ गई , पर यहां की भी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी और उन्हें घर पर खाली बैठना भी गंवारा नहीं था, सो उन्होंने एक कमरा किराए पर लेकर किराना दुकान शुरू किया। दुकान की आमदनी में से ही किराया भी देना होता था। इस प्रकार किसी तरह काम चल रहा था। इसी दौरान उन्हें सक्षम योजना की जानकारी मिली, जिसके तहत विधवा, परित्यक्ता और 35 से 45 वर्ष आयु की अविवाहित महिलाओं को आय मूलक गतिविधियों जोड़ने और उन्हें आर्थिक सहयोग प्रदान करने के लिए एक लाख रूपए तक की ऋण राशि प्रदान की जाती है। उन्होंने बताया कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और संबंधित परियोजना अधिकारी की मदद से योजना के तहत बड़ी आसानी से उन्हें एक लाख रूपए का ऋण मिल गया।

श्रीमती हीरा ने बताया कि ऋण राशि मिलने पर उन्होंने उस कमरे को खरीद लिया जहां पहले किराए पर किराना दुकान संचालित कर रहीं थी। साथ ही दुकान में दैनिक उपयोग की और अधिक सामग्रियां भी भरवा लिया, इससे दुकान बढ़ने के साथ-साथ आमदनी भी अधिक होने लगी। श्रीमती हीरा ने बताया कि सक्षम योजना की मदद से जिंदगी अब बहुत आसान हो गई है। इस दुकान में हर माह 90 हजार से एक लाख रूपए तक की बिक्री हो जाती है, जिससे उन्हें लगभग 8-10 हजार रूपए की आमदनी हो जाती है। अब खुद की दुकान होने से अलग से किराया भी देना नहीं पड़ता। इससे उनकी काफी बचत हो जाती है।